Monday, October 7, 2013

Waqt kaa tukda


तेरा दिया हुआ वक़्त का टुकड़ा आज फिर चल पड़ा है पर मैं उस वक़्त का क्या करू जो तेरे जाने के बाद थम सा गया है घडी की एक एक टिक टिक तेरी मौजदगी का एहसास दिलाती जैसे तेरे जाने के बाद वो वक़्त गुजरा ही नहीं तेरे जाने से पहेले भी  हम यही थे और तेरे जाने के बाद भी ...
आज तेरे से थोड़ी से बेवफाई करने की गुस्ताखी कर  रहे है किसी और को प्यार करने की इजाजतदे रहे है

न मुमकिन ये हम जानते है पर तेरे गम वक़्त को गुजरने की कोशिस केर रहे है वो वक़्त तेरे इंतज़ार में गुजरा अब गुजरेगा मौत के इंतज़ार में लगता है मौत आज कल हम प्यार के नाम पर हंस पड़ते है सबको गुमा हो जाता है की हमने मुह्हबत में एक मुक़ाम हासिल किया हुआ क्या बताये उनको की तेरे इंतज़ार में आंखों से न सोने का वादा लिया हुआ है...............