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तेरा दिया हुआ वक़्त का टुकड़ा
आज फिर चल पड़ा है पर मैं उस वक़्त का क्या करू जो तेरे जाने के बाद थम सा गया है घडी
की एक एक टिक टिक तेरी मौजदगी का एहसास दिलाती जैसे तेरे जाने के बाद वो वक़्त
गुजरा ही नहीं तेरे जाने से पहेले भी हम
यही थे और तेरे जाने के बाद भी ...
आज तेरे से थोड़ी से बेवफाई करने की गुस्ताखी कर रहे है किसी और को
प्यार करने की इजाजतदे रहे है
न मुमकिन ये हम जानते है पर तेरे गम वक़्त को गुजरने की कोशिस केर रहे है वो वक़्त तेरे इंतज़ार में गुजरा
अब गुजरेगा मौत के इंतज़ार में लगता है मौत आज कल हम प्यार के नाम पर
हंस पड़ते है सबको गुमा हो जाता है की हमने मुह्हबत में एक मुक़ाम हासिल किया हुआ
क्या बताये उनको की तेरे इंतज़ार में आंखों से न सोने का वादा लिया हुआ है...............
